सूरह 93 अज़्-ज़ुह़ा, आयत 1 – 11
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وَالضُّحَىٰ
कस़म है धूप चढ़ने के समय की!
93:1 -
وَاللَّيْلِ إِذَا سَجَىٰ
और क़सम है रात की, जब वह छा जाए।
93:2 -
مَا وَدَّعَكَ رَبُّكَ وَمَا قَلَىٰ
(ऐ नबी!) तेरे पालनहार ने तुझे न तो छोड़ा और न नाराज़ हुआ।
93:3 -
وَلَلْآخِرَةُ خَيْرٌ لَكَ مِنَ الْأُولَىٰ
और निश्चित रूप से आख़िरत आपके लिए दुनिया से बेहतर है।
93:4 -
وَلَسَوْفَ يُعْطِيكَ رَبُّكَ فَتَرْضَىٰ
और निश्चय तेरा पालनहार तुझे प्रदान करेगा, तो तू प्रसन्न हो जाएगा।
93:5 -
أَلَمْ يَجِدْكَ يَتِيمًا فَآوَىٰ
क्या उसने आपको अनाथ पाकर शरण नहीं दी?
93:6 -
وَوَجَدَكَ ضَالًّا فَهَدَىٰ
और आपको मार्ग से अनभिज्ञ पाया, तो सीधा मार्ग दिखाया।
93:7 -
وَوَجَدَكَ عَائِلًا فَأَغْنَىٰ
और उसने आपको निर्धन पाया, तो संपन्न कर दिया।
93:8 -
فَأَمَّا الْيَتِيمَ فَلَا تَقْهَرْ
अतः आप अनाथ पर कठोरता न दिखाएँ।
93:9 -
وَأَمَّا السَّائِلَ فَلَا تَنْهَرْ
और माँगने वाले को न झिड़कें।
93:10 -
وَأَمَّا بِنِعْمَةِ رَبِّكَ فَحَدِّثْ
और अपने रब के उपकार का वर्णन करते रहें।
93:11
अनुवाद: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी