सूरह 75 अल्-क़ियामह, आयत 1 – 10
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لَا أُقْسِمُ بِيَوْمِ الْقِيَامَةِ
मैं क़सम खाता हूँ क़ियामत के दिन की।
75:1 -
وَلَا أُقْسِمُ بِالنَّفْسِ اللَّوَّامَةِ
तथा मैं क़सम खाता हूँ निंदा करने वाली अंतरात्मा की।
75:2 -
أَيَحْسَبُ الْإِنْسَانُ أَلَّنْ نَجْمَعَ عِظَامَهُ
क्या इनसान समझता है कि हम कभी उसकी हड्डियों को एकत्र नहीं करेंगे?
75:3 -
بَلَىٰ قَادِرِينَ عَلَىٰ أَنْ نُسَوِّيَ بَنَانَهُ
क्यों नहीं? हम इस बता का भी सामर्थ्य रखते हैं कि उसकी उंगलियों की पोर-पोर सीधी कर दें।
75:4 -
بَلْ يُرِيدُ الْإِنْسَانُ لِيَفْجُرَ أَمَامَهُ
बल्कि मनुष्य चाहता है कि अपने आगे भी गुनाह करता रहे।
75:5 -
يَسْأَلُ أَيَّانَ يَوْمُ الْقِيَامَةِ
वह पूछता है कि क़ियामत का दिन कब होगा?
75:6 -
فَإِذَا بَرِقَ الْبَصَرُ
तो जब आँख चौंधिया जाएगी।
75:7 -
وَخَسَفَ الْقَمَرُ
और चाँद को ग्रहण लग जाएगा।
75:8 -
وَجُمِعَ الشَّمْسُ وَالْقَمَرُ
और सूर्य और चाँद एकत्र कर दिए जाएँगे।
75:9 -
يَقُولُ الْإِنْسَانُ يَوْمَئِذٍ أَيْنَ الْمَفَرُّ
उस दिन मनुष्य कहेगा कि भागने का स्थान कहाँ है?
75:10
अनुवाद: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी