सूरह 54 अल्-क़मर, आयत 1 – 7

  1. اقْتَرَبَتِ السَّاعَةُ وَانْشَقَّ الْقَمَرُ

    क़ियामत बहुत निकट आ गई और चाँद फट गया।

    54:1
  2. وَإِنْ يَرَوْا آيَةً يُعْرِضُوا وَيَقُولُوا سِحْرٌ مُسْتَمِرٌّ

    और यदि वे कोई निशानी देखते हैं, तो मुँह फेर लेते हैं और कहते हैं कि (यह) एक जादू है जो समाप्त हो जाने वाला है।

    54:2
  3. وَكَذَّبُوا وَاتَّبَعُوا أَهْوَاءَهُمْ ۚ وَكُلُّ أَمْرٍ مُسْتَقِرٌّ

    उन्होंने झुठलाया और अपनी इच्छाओं का पालन किया और प्रत्येक कार्य का एक निश्चित समय है।

    54:3
  4. وَلَقَدْ جَاءَهُمْ مِنَ الْأَنْبَاءِ مَا فِيهِ مُزْدَجَرٌ

    और निःसंदेह उनके पास ऐसी सूचनाएँ आ चुकी हैं, जिनमें डाँटडपट है।

    54:4
  5. حِكْمَةٌ بَالِغَةٌ ۖ فَمَا تُغْنِ النُّذُرُ

    पूर्णतया हिकमत है, फिर भी डरानेवाली चीज़ें काम नहीं आतीं।

    54:5
  6. فَتَوَلَّ عَنْهُمْ ۘ يَوْمَ يَدْعُ الدَّاعِ إِلَىٰ شَيْءٍ نُكُرٍ

    अतः आप उनसे मुँह फेर लें, जिस दिन पुकारने वाला एक अप्रिय चीज़ की ओर पुकारेगा।

    54:6
  7. خُشَّعًا أَبْصَارُهُمْ يَخْرُجُونَ مِنَ الْأَجْدَاثِ كَأَنَّهُمْ جَرَادٌ مُنْتَشِرٌ

    उनकी आँखें झुकी होंगी। वे कब्रों से ऐसे निकलेंगे, जैसे वे बिखरी हुई टिड्डियाँ हों।

    54:7

अनुवाद: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी