सूरह 3 आले इम्रान, आयत 65 – 67
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يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لِمَ تُحَاجُّونَ فِي إِبْرَاهِيمَ وَمَا أُنْزِلَتِ التَّوْرَاةُ وَالْإِنْجِيلُ إِلَّا مِنْ بَعْدِهِ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
ऐ किताब वालो! तुम इबराहीम के (धर्म के) बारे में क्यों झगड़ते हो? जबकि तौरात और इंजील तो उसके पश्चात ही उतारे गए हैं, तो क्या तुम समझते नहीं?
3:65 -
هَا أَنْتُمْ هَٰؤُلَاءِ حَاجَجْتُمْ فِيمَا لَكُمْ بِهِ عِلْمٌ فَلِمَ تُحَاجُّونَ فِيمَا لَيْسَ لَكُمْ بِهِ عِلْمٌ ۚ وَاللَّهُ يَعْلَمُ وَأَنْتُمْ لَا تَعْلَمُونَ
देखो, तुम वे लोग हो कि तुमने उस विषय में वाद-विवाद किया, जिसके बारे में तुम्हें कुछ ज्ञान था, तो उस विषय में क्यों वाद-विवाद करते हो, जिसका तुम्हें कुछ ज्ञान नहीं? तथा अल्लाह जानता है और तुम नहीं जानते।
3:66 -
مَا كَانَ إِبْرَاهِيمُ يَهُودِيًّا وَلَا نَصْرَانِيًّا وَلَٰكِنْ كَانَ حَنِيفًا مُسْلِمًا وَمَا كَانَ مِنَ الْمُشْرِكِينَ
इबराहीम न यहूदी थे और न ईसाई, बल्कि वह एकाग्रचित आज्ञाकारी थे। तथा वह बहुदेववादियों में से न थे।
3:67
अनुवाद: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी