सूरह 34 सबा, आयत 12 – 18
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وَلِسُلَيْمَانَ الرِّيحَ غُدُوُّهَا شَهْرٌ وَرَوَاحُهَا شَهْرٌ ۖ وَأَسَلْنَا لَهُ عَيْنَ الْقِطْرِ ۖ وَمِنَ الْجِنِّ مَنْ يَعْمَلُ بَيْنَ يَدَيْهِ بِإِذْنِ رَبِّهِ ۖ وَمَنْ يَزِغْ مِنْهُمْ عَنْ أَمْرِنَا نُذِقْهُ مِنْ عَذَابِ السَّعِيرِ
तथा (हमने) सुलैमान के लिए हवा को (वशीभूत कर दिया)। उसका सुबह का चलना एक महीने का तथा शाम का चलना एक महीने का होता था। तथा हमने उसके लिए तांबे का स्रोत बहा दिया। तथा कुछ जिन्नों को भी (उसके वश में कर दिया), जो उसके सामने उसके पालनहार की अनुमति से काम करते थे। तथा उनमें से जो भी हमारे आदेश से फिरेगा, हम उसे भड़कती आग की यातना चखाएँगे।
34:12 -
يَعْمَلُونَ لَهُ مَا يَشَاءُ مِنْ مَحَارِيبَ وَتَمَاثِيلَ وَجِفَانٍ كَالْجَوَابِ وَقُدُورٍ رَاسِيَاتٍ ۚ اعْمَلُوا آلَ دَاوُودَ شُكْرًا ۚ وَقَلِيلٌ مِنْ عِبَادِيَ الشَّكُورُ
वे उसके लिए बनाते थे, जो वह चाहता था; भवन (मस्जिदें), प्रतिमाएँ, हौज़ों के जैसे बड़े-बड़े लगन तथा एक ही जगह जमी हुई देगें। ऐ दाऊद के परिजनो! कृतज्ञता के तौर पर सत्कर्म करो। और मेरे बंदों में थोड़े ही लोग कृतज्ञ हैं।
34:13 -
فَلَمَّا قَضَيْنَا عَلَيْهِ الْمَوْتَ مَا دَلَّهُمْ عَلَىٰ مَوْتِهِ إِلَّا دَابَّةُ الْأَرْضِ تَأْكُلُ مِنْسَأَتَهُ ۖ فَلَمَّا خَرَّ تَبَيَّنَتِ الْجِنُّ أَنْ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ الْغَيْبَ مَا لَبِثُوا فِي الْعَذَابِ الْمُهِينِ
फिर जब हमने सुलैमान की मौत का निर्णय कर दिया, तो जिन्नों को उसकी मौत का पता एक घुन के सिवा किसी ने नहीं दिया, जो उसकी लाठी को खा रहा था। फिर जब वह गिर गया, तो जिन्नों पर यह बात खुली कि यदि वे परोक्ष का ज्ञान रखते, तो इस अपमानकारी यातना में पड़े न रहते।
34:14 -
لَقَدْ كَانَ لِسَبَإٍ فِي مَسْكَنِهِمْ آيَةٌ ۖ جَنَّتَانِ عَنْ يَمِينٍ وَشِمَالٍ ۖ كُلُوا مِنْ رِزْقِ رَبِّكُمْ وَاشْكُرُوا لَهُ ۚ بَلْدَةٌ طَيِّبَةٌ وَرَبٌّ غَفُورٌ
सबा जाति के लिए उनके निवास-स्थान में एक निशानी थी। (उसके) दाएँ और बाएँ दो बाग़ थे। (हमने कहा था :) अपने पालनहार की दी हुई रोज़ी से खाओ और उसके प्रति आभार प्रकट करो। (यह) एक अच्छा शहर है तथा अति क्षमाशील पालनहार है।
34:15 -
فَأَعْرَضُوا فَأَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ سَيْلَ الْعَرِمِ وَبَدَّلْنَاهُمْ بِجَنَّتَيْهِمْ جَنَّتَيْنِ ذَوَاتَيْ أُكُلٍ خَمْطٍ وَأَثْلٍ وَشَيْءٍ مِنْ سِدْرٍ قَلِيلٍ
लेकिन उन्होंने मुँह फेर लिया, तो हमने उनपर भयंकर (बाँध तोड़) बाढ़ भेज दी, तथा उनके दोनों बाग़ों को दो ऐसे बाग़ों से बदल दिए, जिनमें कड़वे-कसैले फल, झाऊ के वृक्ष तथा कुछ थोड़े-से बेर थे।
34:16 -
ذَٰلِكَ جَزَيْنَاهُمْ بِمَا كَفَرُوا ۖ وَهَلْ نُجَازِي إِلَّا الْكَفُورَ
यह बदला हमने उन्हें उनके कृतघ्नता दिखाने के कारण दिया, तथा ऐसा बदला हम उसी को देते हैं जो बहुत कृतघ्न हो।
34:17 -
وَجَعَلْنَا بَيْنَهُمْ وَبَيْنَ الْقُرَى الَّتِي بَارَكْنَا فِيهَا قُرًى ظَاهِرَةً وَقَدَّرْنَا فِيهَا السَّيْرَ ۖ سِيرُوا فِيهَا لَيَالِيَ وَأَيَّامًا آمِنِينَ
और हमने उनके बीच तथा उन बस्तियों के बीच, जिनमें हमने बरकत रखी थी, एक-दूसरे से दिखाई देने वाली बस्तियाँ बना दी थीं, तथा हमने उनमें यात्रा के पड़ाव निर्धारित कर दिए थे (और कह दिया था :) तुम उनमें रात-दिन निश्चिंत होकर चलो फिरो।
34:18
अनुवाद: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी