सूरह 28 अल्-क़सस, आयत 29 – 42

  1. فَلَمَّا قَضَىٰ مُوسَى الْأَجَلَ وَسَارَ بِأَهْلِهِ آنَسَ مِنْ جَانِبِ الطُّورِ نَارًا قَالَ لِأَهْلِهِ امْكُثُوا إِنِّي آنَسْتُ نَارًا لَعَلِّي آتِيكُمْ مِنْهَا بِخَبَرٍ أَوْ جَذْوَةٍ مِنَ النَّارِ لَعَلَّكُمْ تَصْطَلُونَ

    फिर जब मूसा ने वह अवधि पूरी कर दी और अपने परिवार को लेकर चला, तो उसने तूर (पर्वत) की ओर से एक आग देखी। उसने अपने परिवार से कहा : ठहरो, मैंने एक आग देखी है, संभव है कि मैं तुम्हारे लिए उससे कोई समाचार ले आऊँ, या आग का कोई अंगारा, ताकि तुम ताप लो।

    28:29
  2. فَلَمَّا أَتَاهَا نُودِيَ مِنْ شَاطِئِ الْوَادِ الْأَيْمَنِ فِي الْبُقْعَةِ الْمُبَارَكَةِ مِنَ الشَّجَرَةِ أَنْ يَا مُوسَىٰ إِنِّي أَنَا اللَّهُ رَبُّ الْعَالَمِينَ

    फिर जब वह उसके पास आया, तो उस बरकत वाली जगह में घाटी के दाहिनी ओर से एक वृक्ष से आवाज़ दी गई : ऐ मूसा! निःसंदेह मैं ही अल्लाह हूँ, जो सारे संसारों का पालनहार है।

    28:30
  3. وَأَنْ أَلْقِ عَصَاكَ ۖ فَلَمَّا رَآهَا تَهْتَزُّ كَأَنَّهَا جَانٌّ وَلَّىٰ مُدْبِرًا وَلَمْ يُعَقِّبْ ۚ يَا مُوسَىٰ أَقْبِلْ وَلَا تَخَفْ ۖ إِنَّكَ مِنَ الْآمِنِينَ

    और यह कि अपनी लाठी फेंक दो। फिर जब उसने उसे देखा कि रेंग रही है, मानो वह एक साँप है, तो पीठ फेरकर चल दिया और पीछे नहीं मुड़ा। ऐ मूसा! आगे बढ़ो और डरो मत, निश्चित रूप से तुम सुरक्षित रहने वालों में से हो।

    28:31
  4. اسْلُكْ يَدَكَ فِي جَيْبِكَ تَخْرُجْ بَيْضَاءَ مِنْ غَيْرِ سُوءٍ وَاضْمُمْ إِلَيْكَ جَنَاحَكَ مِنَ الرَّهْبِ ۖ فَذَانِكَ بُرْهَانَانِ مِنْ رَبِّكَ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَمَلَئِهِ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا قَوْمًا فَاسِقِينَ

    अपना हाथ अपने गरीबान में डाल। वह बिना किसी दोष के सफेद (चमकदार) निकलेगा। और भय से (बचने के लिए) अपनी भुजा को अपनी ओर चिमटा ले। तो ये दोनों तेरे पालनहार की ओर से फ़िरऔन तथा उसके प्रमुखों के लिए दो प्रमाण हैं। निःसंदेह वे हमेशा से अवज्ञाकारी लोग हैं।

    28:32
  5. قَالَ رَبِّ إِنِّي قَتَلْتُ مِنْهُمْ نَفْسًا فَأَخَافُ أَنْ يَقْتُلُونِ

    उसने कहा : ऐ मेरे पालनहार! मैंने उनमें से एक व्यक्ति को क़त्ल किया है। इसलिए मैं डरता हूँ कि वे मुझे मार देंगे।

    28:33
  6. وَأَخِي هَارُونُ هُوَ أَفْصَحُ مِنِّي لِسَانًا فَأَرْسِلْهُ مَعِيَ رِدْءًا يُصَدِّقُنِي ۖ إِنِّي أَخَافُ أَنْ يُكَذِّبُونِ

    और मेरा भाई हारून, वह ज़बान में मुझसे अधिक वाक्पटु है। अतः उसे मेरे साथ सहायक बनाकर भेज कि वह मेरी तसदीक़ करे। निःसंदेह मैं डरता हूँ कि वे मुझे झुठला देंगे।

    28:34
  7. قَالَ سَنَشُدُّ عَضُدَكَ بِأَخِيكَ وَنَجْعَلُ لَكُمَا سُلْطَانًا فَلَا يَصِلُونَ إِلَيْكُمَا ۚ بِآيَاتِنَا أَنْتُمَا وَمَنِ اتَّبَعَكُمَا الْغَالِبُونَ

    फरमाया : हम तेरे भाई के साथ तेरा हाथ अवश्य मज़बूत करेंगे और तुम दोनों को प्रभुता प्रदान करेंगे। अतः वे तुम दोनों तक नहीं पहुँच सकेंगे। हमारी निशानियों के कारण तुम दोनों और जिन्होंने तुम्हारा अनुसरण किया, प्रभावी रहने वाले हो।

    28:35
  8. فَلَمَّا جَاءَهُمْ مُوسَىٰ بِآيَاتِنَا بَيِّنَاتٍ قَالُوا مَا هَٰذَا إِلَّا سِحْرٌ مُفْتَرًى وَمَا سَمِعْنَا بِهَٰذَا فِي آبَائِنَا الْأَوَّلِينَ

    फिर जब मूसा उनके पास हमारी खुली निशानियाँ लेकर आए, तो उन्होंने कहा : यह तो बस एक मनगढ़ंत जादू है और हमने इसे अपने पहले बाप-दादों में नहीं सुना।

    28:36
  9. وَقَالَ مُوسَىٰ رَبِّي أَعْلَمُ بِمَنْ جَاءَ بِالْهُدَىٰ مِنْ عِنْدِهِ وَمَنْ تَكُونُ لَهُ عَاقِبَةُ الدَّارِ ۖ إِنَّهُ لَا يُفْلِحُ الظَّالِمُونَ

    तथा मूसा ने कहा : मेरा पालनहार उसे अधिक जानने वाला है जो उसके पास से मार्गदर्शन लेकर आया और उसको भी जिसके लिए (आख़िरत के) घर का परिणाम अच्छा होगा। निःसंदेह सत्य यह है कि अत्याचारी सफल नहीं होते।

    28:37
  10. وَقَالَ فِرْعَوْنُ يَا أَيُّهَا الْمَلَأُ مَا عَلِمْتُ لَكُمْ مِنْ إِلَٰهٍ غَيْرِي فَأَوْقِدْ لِي يَا هَامَانُ عَلَى الطِّينِ فَاجْعَلْ لِي صَرْحًا لَعَلِّي أَطَّلِعُ إِلَىٰ إِلَٰهِ مُوسَىٰ وَإِنِّي لَأَظُنُّهُ مِنَ الْكَاذِبِينَ

    तथा फ़िरऔन ने कहा : ऐ प्रमुखो! मैंने अपने सिवा तुम्हारे लिए कोई पूज्य नहीं जाना। तो ऐ हामान! मेरे लिए मिट्टी पर आग जला, फिर मेरे लिए एक ऊँचा भवन बना, ताकि मैं मूसा के पूज्य को झाँककर देखूँ। और निःसंदेह मैं निश्चय उसे झूठों में से समझता हूँ।

    28:38
  11. وَاسْتَكْبَرَ هُوَ وَجُنُودُهُ فِي الْأَرْضِ بِغَيْرِ الْحَقِّ وَظَنُّوا أَنَّهُمْ إِلَيْنَا لَا يُرْجَعُونَ

    तथा वह और उसकी सेना बिना किसी अधिकार के देश में बड़े बन बैठे और उन्होंने सोचा कि निश्चित रूप से वे हमारे पास वापस नहीं लाए जाएँगे।

    28:39
  12. فَأَخَذْنَاهُ وَجُنُودَهُ فَنَبَذْنَاهُمْ فِي الْيَمِّ ۖ فَانْظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الظَّالِمِينَ

    तो हमने उसे और उसकी सेनाओं को पकड़ लिया, फिर उन्हें समुद्र में फेंक दिया। तो देखो कि अत्याचारियों का अंत (परिणाम) कैसा था।

    28:40
  13. وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ ۖ وَيَوْمَ الْقِيَامَةِ لَا يُنْصَرُونَ

    और हमने उन्हें ऐसे अगवा बनाया, जो आग की ओर बुलाते थे और क़ियामत के दिन उनकी मदद नहीं की जाएगी।

    28:41
  14. وَأَتْبَعْنَاهُمْ فِي هَٰذِهِ الدُّنْيَا لَعْنَةً ۖ وَيَوْمَ الْقِيَامَةِ هُمْ مِنَ الْمَقْبُوحِينَ

    और हमने इस संसार में उनके पीछे धिक्कार लगा दी और क़ियामत के दिन वे ठुकराए गए लोगों में से होंगे।

    28:42

अनुवाद: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी