सूरह 26 अश्-शु-अ़-रा, आयत 124 – 135
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إِذْ قَالَ لَهُمْ أَخُوهُمْ هُودٌ أَلَا تَتَّقُونَ
जब उनसे उनके भाई हूद ने कहा : क्या तुम डरते नहीं हो?
26:124 -
إِنِّي لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌ
निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ।
26:125 -
فَاتَّقُوا اللَّهَ وَأَطِيعُونِ
अतः तुम अल्लाह से डरो और मेरी बात मानो।
26:126 -
وَمَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِيَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ الْعَالَمِينَ
मैं इस (कार्य) पर तुमसे कोई पारिश्रमिक (बदला) नहीं माँगता, मेरा बदला तो केवल सारे संसारों के पालनहार पर है।
26:127 -
أَتَبْنُونَ بِكُلِّ رِيعٍ آيَةً تَعْبَثُونَ
क्या तुम हर ऊँचे स्थान पर एक स्मारक बनाते हो? इस स्थिति में कि व्यर्थ कार्य करते हो।
26:128 -
وَتَتَّخِذُونَ مَصَانِعَ لَعَلَّكُمْ تَخْلُدُونَ
तथा बड़े-बड़े भवन बनाते हो, शायद कि तुम सदा जीवित रहोगे।
26:129 -
وَإِذَا بَطَشْتُمْ بَطَشْتُمْ جَبَّارِينَ
और जब तुम पकड़ते हो, तो बड़ी निर्दयता से पकड़ते हो।
26:130 -
فَاتَّقُوا اللَّهَ وَأَطِيعُونِ
अतः अल्लाह से डरो और जो मैं कहता हूँ, उसे मानो।
26:131 -
وَاتَّقُوا الَّذِي أَمَدَّكُمْ بِمَا تَعْلَمُونَ
तथा उससे डरो जिसने उन चीज़ों से तुम्हारी मदद की, जिन्हें तुम जानते हो।
26:132 -
أَمَدَّكُمْ بِأَنْعَامٍ وَبَنِينَ
उसने चौपायों और बेटों से तुम्हारी मदद की।
26:133 -
وَجَنَّاتٍ وَعُيُونٍ
तथा बाग़ों और जल स्रोताें से।
26:134 -
إِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ
निश्चय ही मैं तुमपर एक बड़े दिन की यातना से डरता हूँ।
26:135
अनुवाद: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी