सूरह 25 अल्-फ़ुर्क़ान, आयत 63 – 66

  1. وَعِبَادُ الرَّحْمَٰنِ الَّذِينَ يَمْشُونَ عَلَى الْأَرْضِ هَوْنًا وَإِذَا خَاطَبَهُمُ الْجَاهِلُونَ قَالُوا سَلَامًا

    और 'रह़मान' के बंदे वे हैं, जो धरती पर विनम्रता से चलते हैं और जब जाहिल (अक्खड़) लोग उनसे बात करते हैं, तो कहते हैं सलाम है।

    25:63
  2. وَالَّذِينَ يَبِيتُونَ لِرَبِّهِمْ سُجَّدًا وَقِيَامًا

    और जो अपने पालनहार के लिए सजदा करते हुए तथा खड़े होकर रात गुज़ारते हैं।

    25:64
  3. وَالَّذِينَ يَقُولُونَ رَبَّنَا اصْرِفْ عَنَّا عَذَابَ جَهَنَّمَ ۖ إِنَّ عَذَابَهَا كَانَ غَرَامًا

    तथा जो कहते हैं कि ऐ हमारे पालनहार! हमसे जहन्नम की यातना को हटा दे। निःसंदेह उसकी यातना चिमट जाने वाली है।

    25:65
  4. إِنَّهَا سَاءَتْ مُسْتَقَرًّا وَمُقَامًا

    निःसंदेह वह बुरी ठहरने की जगह और निवास की जगह है।

    25:66

अनुवाद: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी