सूरह 18 अल्-कह्फ़, आयत 60 – 82

  1. وَإِذْ قَالَ مُوسَىٰ لِفَتَاهُ لَا أَبْرَحُ حَتَّىٰ أَبْلُغَ مَجْمَعَ الْبَحْرَيْنِ أَوْ أَمْضِيَ حُقُبًا

    तथा (याद करो) जब मूसा ने अपने युवक (सेवक) से कहा : मैं बराबर चलता रहूँगा, यहाँ तक कि दो सागरों के संगम पर पहुँच जाऊँ या वर्षों चलता रहूँ।

    18:60
  2. فَلَمَّا بَلَغَا مَجْمَعَ بَيْنِهِمَا نَسِيَا حُوتَهُمَا فَاتَّخَذَ سَبِيلَهُ فِي الْبَحْرِ سَرَبًا

    फिर जब वे दोनों उन दोनों (सागरों) के मिलने की जगह पर पहुँचे, तो वे दोनों अपनी मछली भूल गए और उसने सागर में अपना रास्ता सुरंग जैसा बना लिया।

    18:61
  3. فَلَمَّا جَاوَزَا قَالَ لِفَتَاهُ آتِنَا غَدَاءَنَا لَقَدْ لَقِينَا مِنْ سَفَرِنَا هَٰذَا نَصَبًا

    फिर जब दोनों आगे बढ़ गए, तो मूसा ने अपने सेवक से कहा कि हमारा खाना लाओ। हम अपनी इस यात्रा से काफ़ी थक गए हैं।

    18:62
  4. قَالَ أَرَأَيْتَ إِذْ أَوَيْنَا إِلَى الصَّخْرَةِ فَإِنِّي نَسِيتُ الْحُوتَ وَمَا أَنْسَانِيهُ إِلَّا الشَّيْطَانُ أَنْ أَذْكُرَهُ ۚ وَاتَّخَذَ سَبِيلَهُ فِي الْبَحْرِ عَجَبًا

    उसने कहा : क्या आपने देखा? जब हम चट्टान के पास ठहरे थे तो निःसंदेह मैं मछली भूल गया, और मुझे शैतान ही ने भुलाया कि मैं (आपसे) उसकी चर्चा करूँ, और उसने अनोखे तरीक़े से सागर में अपनी राह बना ली।

    18:63
  5. قَالَ ذَٰلِكَ مَا كُنَّا نَبْغِ ۚ فَارْتَدَّا عَلَىٰ آثَارِهِمَا قَصَصًا

    मूसा ने कहा : यही तो है, जो हम तलाश कर रहे थे। फिर वे दोनों अपने क़दमों के निशान देखते हुए वापस लौटे।

    18:64
  6. فَوَجَدَا عَبْدًا مِنْ عِبَادِنَا آتَيْنَاهُ رَحْمَةً مِنْ عِنْدِنَا وَعَلَّمْنَاهُ مِنْ لَدُنَّا عِلْمًا

    तो उन दोनों ने हमारे बंदों में से एक बंदे को पाया, जिसे हमने अपने पास से दया प्रदान की थी और उसे अपने पास से एक ज्ञान सिखाया था।

    18:65
  7. قَالَ لَهُ مُوسَىٰ هَلْ أَتَّبِعُكَ عَلَىٰ أَنْ تُعَلِّمَنِ مِمَّا عُلِّمْتَ رُشْدًا

    मूसा ने उनसे कहा : क्या मैं आपका अनुसरण करूँ, इस (शर्त) पर कि मुझे उस मार्गदर्शन की बातों में से कुछ सिखा दें, जो आपको सिखाई गई हैं?

    18:66
  8. قَالَ إِنَّكَ لَنْ تَسْتَطِيعَ مَعِيَ صَبْرًا

    उन्होंने कहा : तुम मेरे साथ हरगिज़ धैर्य न रख सकोगे।

    18:67
  9. وَكَيْفَ تَصْبِرُ عَلَىٰ مَا لَمْ تُحِطْ بِهِ خُبْرًا

    और तुम उसपर कैसे धीरज रख सकते हो, जिसका तुम्हें पूरा ज्ञान नहीं?

    18:68
  10. قَالَ سَتَجِدُنِي إِنْ شَاءَ اللَّهُ صَابِرًا وَلَا أَعْصِي لَكَ أَمْرًا

    उसने कहा : यदि अल्लाह ने चाहा, तो आप मुझे धैर्य रखने वाला पाएँगे और मैं आपके किसी आदेश का उल्लंघन नहीं करूँगा।

    18:69
  11. قَالَ فَإِنِ اتَّبَعْتَنِي فَلَا تَسْأَلْنِي عَنْ شَيْءٍ حَتَّىٰ أُحْدِثَ لَكَ مِنْهُ ذِكْرًا

    उन्होंने कहा : यदि तुम्हें मेरा अनुसरण करना है, तो मुझसे किसी चीज़ के बारे में प्रश्न न करना, यहाँ तक कि मैं (स्वयं ही) तुमसे उसकी चर्चा शुरू करूँ।

    18:70
  12. فَانْطَلَقَا حَتَّىٰ إِذَا رَكِبَا فِي السَّفِينَةِ خَرَقَهَا ۖ قَالَ أَخَرَقْتَهَا لِتُغْرِقَ أَهْلَهَا لَقَدْ جِئْتَ شَيْئًا إِمْرًا

    फिर वे दोनों चले, यहाँ तक कि जब वे नौका पर सवार हुए, तो उस (ख़ज़िर) ने उसे फाड़ दिया। मूसा ने कहा : क्या आपने इसे इसलिए फाड़ दिया है कि इसके सवारों को डुबो दें? निश्चित रूप से आपने एक गंभीर काम कर डाला।

    18:71
  13. قَالَ أَلَمْ أَقُلْ إِنَّكَ لَنْ تَسْتَطِيعَ مَعِيَ صَبْرًا

    उन्होंने कहा : क्या मैंने नहीं कहा था कि तुम मेरे साथ हरगिज़ धैर्य न रख सकोगे?

    18:72
  14. قَالَ لَا تُؤَاخِذْنِي بِمَا نَسِيتُ وَلَا تُرْهِقْنِي مِنْ أَمْرِي عُسْرًا

    मूसा ने कहा : मुझे मेरी भूल पर न पकड़ें और मेरे मामले में मुझे किसी कठिनाई में न डालें।

    18:73
  15. فَانْطَلَقَا حَتَّىٰ إِذَا لَقِيَا غُلَامًا فَقَتَلَهُ قَالَ أَقَتَلْتَ نَفْسًا زَكِيَّةً بِغَيْرِ نَفْسٍ لَقَدْ جِئْتَ شَيْئًا نُكْرًا

    फिर वे दोनों चल पड़े, यहाँ तक कि जब वे एक बालक से मिले, तो उस (ख़ज़िर) ने उसे क़त्ल कर दिया। उस (मूसा) ने कहा : क्या आपने एक निर्दोष जान को किसी जान के बदले के बिना क़त्ल कर दिया? निःसंदेह आपने बहुत ही बुरा काम किया।

    18:74
  16. قَالَ أَلَمْ أَقُلْ لَكَ إِنَّكَ لَنْ تَسْتَطِيعَ مَعِيَ صَبْرًا

    उन्होंने कहा : क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था कि निश्चय तुम मेरे साथ हरगिज़ धैर्य न रख सकोगे?

    18:75
  17. قَالَ إِنْ سَأَلْتُكَ عَنْ شَيْءٍ بَعْدَهَا فَلَا تُصَاحِبْنِي ۖ قَدْ بَلَغْتَ مِنْ لَدُنِّي عُذْرًا

    (मूसा ने) कहा : यदि मैं इसके बाद आपसे किसी चीज़ के विषय में प्रश्न करूँ, तो मुझे अपने साथ न रखें। निश्चय आप मेरी ओर से उज़्र को पहुँच चुके।

    18:76
  18. فَانْطَلَقَا حَتَّىٰ إِذَا أَتَيَا أَهْلَ قَرْيَةٍ اسْتَطْعَمَا أَهْلَهَا فَأَبَوْا أَنْ يُضَيِّفُوهُمَا فَوَجَدَا فِيهَا جِدَارًا يُرِيدُ أَنْ يَنْقَضَّ فَأَقَامَهُ ۖ قَالَ لَوْ شِئْتَ لَاتَّخَذْتَ عَلَيْهِ أَجْرًا

    फिर दोनो चले, यहाँ तक कि जब एक गाँव वालों के पास आए, तो उसके वासियों से भोजन माँगा। परंतु उन्होंने उनका अतिथि सत्कार करने से इनकार कर दिया। फिर वहाँ उन्होंने एक दीवार पाई, जो गिरा चाहती थी। तो उस (खज़िर) ने उसे सीधा कर दिया। (मूसा ने) कहा : यदि आप चाहते, तो इसपर पारिश्रमिक ले लेते।

    18:77
  19. قَالَ هَٰذَا فِرَاقُ بَيْنِي وَبَيْنِكَ ۚ سَأُنَبِّئُكَ بِتَأْوِيلِ مَا لَمْ تَسْتَطِعْ عَلَيْهِ صَبْرًا

    उसने कहा : यह मेरे और तुम्हारे बीच जुदाई है। मैं तुम्हें उसकी वास्तविकता बताऊँगा, जिसपर तुम धैर्य नहीं रख सके।

    18:78
  20. أَمَّا السَّفِينَةُ فَكَانَتْ لِمَسَاكِينَ يَعْمَلُونَ فِي الْبَحْرِ فَأَرَدْتُ أَنْ أَعِيبَهَا وَكَانَ وَرَاءَهُمْ مَلِكٌ يَأْخُذُ كُلَّ سَفِينَةٍ غَصْبًا

    रही नाव, तो वह कुछ निर्धनों की थी, जो सागर में काम करते थे। तो मैंने चाहा कि उसे ख़राब कर दूँ और उनके आगे एक राजा था, जो हर (अच्छी) नाव को छीन लेता था।

    18:79
  21. وَأَمَّا الْغُلَامُ فَكَانَ أَبَوَاهُ مُؤْمِنَيْنِ فَخَشِينَا أَنْ يُرْهِقَهُمَا طُغْيَانًا وَكُفْرًا

    और रहा बालक, तो उसके माता-पिता दोनों ईमान वाले थे। अतः हम डरे कि वह उन दोनों को अवज्ञा और कुफ़्र में फँसा देगा।

    18:80
  22. فَأَرَدْنَا أَنْ يُبْدِلَهُمَا رَبُّهُمَا خَيْرًا مِنْهُ زَكَاةً وَأَقْرَبَ رُحْمًا

    इसलिए हमने चाहा कि उन दोनों का पालनहार उन्हें बदले में ऐसा बच्चा दे, जो पवित्रता में उससे बेहतर और करुणा में अधिक क़रीब हो।

    18:81
  23. وَأَمَّا الْجِدَارُ فَكَانَ لِغُلَامَيْنِ يَتِيمَيْنِ فِي الْمَدِينَةِ وَكَانَ تَحْتَهُ كَنْزٌ لَهُمَا وَكَانَ أَبُوهُمَا صَالِحًا فَأَرَادَ رَبُّكَ أَنْ يَبْلُغَا أَشُدَّهُمَا وَيَسْتَخْرِجَا كَنْزَهُمَا رَحْمَةً مِنْ رَبِّكَ ۚ وَمَا فَعَلْتُهُ عَنْ أَمْرِي ۚ ذَٰلِكَ تَأْوِيلُ مَا لَمْ تَسْطِعْ عَلَيْهِ صَبْرًا

    और रही दीवार, तो वह शहर के दो अनाथ लड़कों की थी और उसके नीचे उन दोनों के लिए एक खज़ाना था और उनके पिता नेक थे। तो तेरे पालनहार ने चाहा कि वे दोनों अपनी जवानी को पहुँच जाएँ और अपना खज़ाना निकाल लें, तेरे पालनहार की ओर से दया स्वरूप। और मैंने यह अपनी मर्जी से नहीं किया। यह है उन बातों का असली सच जिनपर तुम धैर्य न रख सके।

    18:82

अनुवाद: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी